ش | ی | د | س | چ | پ | ج |
1 | ||||||
2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 |
16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 |
23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 |
30 | 31 |
پُر است
مغزم
از انبوهِ صداهای تهی
تیر می کشد
قلبم
از احساسی سرسام آور
در روزهای سردِ کاذب
ربوده
هجومِ منفیِ
کابوسی شوم
خواب را
از چشمانِ خسته ی شب
گویی...
گذرِ عمرمان را
زندگی نامیده ایم
در سایه های نقابی
غم انگیز.
فریبا صادق زاده