| ش | ی | د | س | چ | پ | ج |
| 1 | 2 | 3 | ||||
| 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 |
| 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 |
| 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 |
| 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 |
همین که نور بیاورم
برای شب پره ی خیره
در آینه ی تاریک
و آتش دستهایم را بدهم
به تن سرد کبوتر آواره
در گوشه ی حیاط
کافی ست تا بگویم
جهان را دوست دارم؟
و یا برای عشق به جهان
باید چون گلی سرخ باشم
که بی دریغ عطرافشانی می کند؟
علی بارانی