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شب بود
کشتیها رفته بودند
قهوهخانه،
میان ظلمت امواج،
میدرخشید
ناخدا ملول بود
کشتیاش در گرداب
چون چوب کبریت بود
و او تنها بود
صبح،
چای بیبخارتر از هر کس بود
چون ناخدا،
بیصدا،
منجمد شده بود!
فرشید ربانی