| ش | ی | د | س | چ | پ | ج |
| 1 | ||||||
| 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
| 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 |
| 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 |
| 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 |
طوفان شکست پنجره را
وهنوز بوی تنت
تمام گُلهای این خانه را پژمرده
بو میکشم اما
چیزی حس نمیکنم
نه
اشتباه شده، من
آغوش دارم بالشت را
و خفهام
مرگ هرشب تکرار میشود
آنقدر که دیگر
هیچچیز تکراری نیست
علی رفیعی وردنجانی