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پدر؛
مهرویِ زیبای من،
چگونه
آغوشِ گرمت را
سالیان دراز
به روزگار
به حراج گذاشتی؟
و من
مبهوتِ رفتنت،
در پیِ تو
در کورهراههای زندگی
جا ماندم؛
با دستهایی
که هنوز
گرمای تو را
از دیوارها پس میگیرند
و جهانی
که
بی پدر
سردتر
معامله میشود
طیبه ایرانیان