ش | ی | د | س | چ | پ | ج |
1 | ||||||
2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 |
16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 |
23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 |
30 | 31 |
زخم زد
صورت زیبای عشق را
با خنجر .....نفرت
و بُرید طناب اشتیاق را
در پیچ و خم رخوت ریشه ها
آه ؛ که از عطش باران
شیرازه ی جان گسست
وشیرینی رفتن با
تلخی ماندن مساوی شد
نمیدانم
کجای زندگی را به بازی گرفت
که این چنین چرتکه انداخت
به اعتبار عشق...
سپیده رسا