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بیـا عشقت دلم را آتش افروخت
که تا صبح قیامت بایدم سوخت
بـبـایـد در ره وصـلـت حبـیـبـم
زمیـن و اسمـان بر یکدگر دوخت
منم ماهی و چشمت برکـه ی دل
وفـا داری ز ماهـی بـایـد آموخت
چـو گـشته سینـه را گنجینه باید
ز کنج عشق تو در سینه اندوخت
شـده عشقـت مـرا تـار و بـبـایـد
ز تار عشق دیبائی بـه تن دوخت
به وقت مرگ دیـدم چون نکوئی
ز عاشق پیشگی درسم بیاموخت
عباس نکوئی