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روزی که عشق تبر شد
افتاد به ریشهٔ جانم
باور نمیکردم
که میشود
از زخم،
شاخهای جوانه بزند،
که میشود
از درد،
گلی شکوفه کند.
اما نگاهت
همان زخم بود
و همان مرهم،
همان تبر
و همان درخت،
و من
در میانهٔ این تناقض شیرین
به تو ایمان آوردم.
داود شجاعی نیا