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نوشتم:
از روزها
ماهها سالها
از تکرارها
از شلوغی
از شمار بیشمارها
از این انزوا
از این تنهایی بیانتها
از این دنیا
خستهام
تو آمدی
با لبخند
پرسیدی
چایی میخوای؟
خندیدم
سید مرتضی سیدی